दीपक वर्मा - कुनकुरी
लोकेशन - बेहराखार
विकासखंड - कुनकुरी
*राज्यपाल के दौरे से पहले “जागा” प्रशासन! भ्रष्टाचार में डूबे बिरहोरों के अधूरे घरों को रातों-रात चमकाने की कवायद, उठे सवाल*
*कुनकुरी*- कुनकुरी से बड़ी खबर निकलकर सामने आ रही है जहां राष्ट्रपति के दत्तक पुत्र कहे जाने वाले बिरहोर जनजाति के साथ कथित भ्रष्टाचार का मामला अब प्रशासन की कार्यशैली पर बड़े सवाल खड़े कर रहा है। जनमन योजना के तहत बने अधूरे आवासों की खबर पहले सामने आने के बावजूद कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई, लेकिन जैसे ही राज्यपाल श्री रमेन डेका के दौरे की सूचना मिली, प्रशासन अचानक सक्रिय हो गया।
हम बात कर रहे हैं कुनकुरी विकासखंड के बेहराखार शंकर नगर की, जहां बिरहोर परिवारों के लिए स्वीकृत 11 आवास, जिन पर करीब 22 लाख रुपये खर्च दिखाया गया है, लंबे समय से अधूरे और जर्जर स्थिति में पड़े थे। बरसात में टपकती छत, बिना खिड़की-दरवाजे और अधूरी दीवारों के कारण परिवार इन घरों में रहने को तैयार नहीं थे। मजबूरी में वे पुराने झोपड़ों में या पलायन कर अन्य जगहों पर रहने को विवश थे।
सवालों के घेरे में विभाग ?
अब राज्यपाल के आगमन से ठीक पहले इन्हीं अधूरे मकानों की मरम्मत, शौचालय निर्माण और रंग-रोगन का काम युद्ध स्तर पर शुरू कर दिया गया है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि यह कार्रवाई सिर्फ “दिखावे” के लिए की जा रही है, ताकि दौरे के दौरान हकीकत छिपाई जा सके।
ग्रामीणों का कहना है कि :-
पहले शिकायतों पर कोई सुनवाई नहीं हुई,
वर्षों तक अधूरे पड़े मकानों की सुध नहीं ली गई,
अब अचानक तेजी से काम कर “सब ठीक” दिखाने की कोशिश हो रही है।
क्या छिपाई जा रही है सच्चाई?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब पहले ही पूरी राशि आहरित कर ली गई थी, तो निर्माण कार्य अधूरा क्यों छोड़ा गया?
और किस मद की राशि से किया जा रहा मरम्मत कार्य?
अगर खामियां थीं तो, समय रहते सुधार क्यों नहीं किया गया?
भ्रष्टाचार की भेंट चढ़े बोरवेल भी बना सवाल?
मकानों के साथ किए गए बोर खनन में गड़बड़ी के आरोप,
मकानों के साथ बोर खनन भी किए गए थे जिसमें एक भी बोर में एक बूंद भी पानी नहीं निकला था, शो पीस बनकर रह गया,
सवाल है कि 100 या 120 फिट बोर खनन किया गया तो पानी कहां से निकलेगा?
योजनाओं के नाम पर सिर्फ कागजी खानापूर्ति तो हो गई और भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गया।
अब उसी बोर को दुबारा खुदाई किया जा रहा है।
यह कार्य दिखावा या जिम्मेदारी?
वहीं राज्यपाल के दौरे से ठीक पहले प्रशासन की अचानक सक्रियता यह संकेत देती है कि, कहीं न कहीं जिम्मेदार विभाग द्वारा लापरवाही जरूर बरती गई है।
अब यह देखना होगा कि यह मरम्मत सिर्फ वीआईपी विजिट तक सीमित रहती है या बिरहोर परिवारों को वास्तव में सुरक्षित और सम्मानजनक आवास मिल पायेगा।
योजनाएं कागजों में नहीं, ज़मीन पर दिखनी चाहिए।
बिरहोर जैसे संवेदनशील समुदाय के साथ इस तरह की अनदेखी न सिर्फ प्रशासनिक विफलता है।
बल्कि प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करती है।