पत्थलगांव में “170 (ख) जमीन घोटाला ” तहसीलदार-SDM पर उठे गंभीर सवाल , आदिवासी जमीन को बचाने वाला कानून ही बना दलालों का हथियार

पत्थलगांव में “170 (ख) जमीन घोटाला ” तहसीलदार-SDM  पर उठे गंभीर सवाल , आदिवासी जमीन को बचाने वाला कानून ही बना दलालों का हथियार। 

जशपुर/ पत्थलगांव --- जशपुर जिले के पत्थलगांव में आदिवासी जमीन की सुरक्षा के लिए बने कानूनों को ही कथित तौर पर राजस्व माफिया ने कमाई का जरिया बना लिया है। ग्राम बंधियाखार की NH-43 किनारे स्थित कीमती आदिवासी भूमि को लेकर जो खुलासा सामने आया है, उसने पूरे राजस्व विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आरोप सीधे तत्कालीन संबंधित तहसीलदार, SDM, पटवारी और राजस्व कर्मचारियों की मिलीभगत तक पहुंच रहे हैं। 

मामला खसरा नंबर 131/3 रकबा 8 डिसमिल भूमि से जुड़ा है, जो वर्ष 2023 तक राजस्व रिकॉर्ड में आदिवासी भूमि के रूप में दर्ज थी। लेकिन अचानक नियमों को धता बताते हुए 31 मई 2023 को इस जमीन की रजिस्ट्री कर दी गई। 
जिसमें पहला भूमि स्वामी थॉमस व पौलूस से 31/05/2023 को अपने करीबी आदिवासी जयराम तिर्की के नाम कराने के बाद, 23/02/2026 को असली खरीदार गैर - आदिवासी कारोबारी सजन अग्रवाल के बाद राकेश अग्रवाल और बंटी अग्रवाल के नाम चढ़ाए गए हैं, जिन्होंने कानून से बचने के लिए आदिवासी नाम का इस्तेमाल किया है।

बैक डेट आदेश से खुला पूरा खेल

सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस जमीन की रजिस्ट्री 2023 में हुई, उसी जमीन पर धारा 170(ख) का आदेश 03 जनवरी 2022 का कैसे जारी हो गया? यानी सौदा बाद में हुआ और आदेश पहले! इससे साफ संकेत मिलते हैं कि रिकॉर्ड में पीछे की तारीख डालकर पूरा खेल सेट किया गया।
स्थानीय लोगों का आरोप है कि यह कोई साधारण त्रुटि नहीं बल्कि “पूरी प्लानिंग के साथ किया गया राजस्व घोटाला” है, जिसमें बिना अंदरूनी मिलीभगत के रिकॉर्ड अपडेट होना संभव ही नहीं।

तहसीलदार, SDM, पटवारी सब सवालों के घेरे में


अब सवाल उठ रहे हैं कि :- 
आखिर किस अधिकारी की लॉगिन ID से रिकॉर्ड अपडेट हुआ?
वहीं तहसीलदार प्रांजल मिश्रा ने किस आधार पर रजिस्ट्री होने दी?
SDM कार्यालय से बैकडेट आदेश कैसे जारी हुआ?
हल्का पटवारी और रीडर ने रिकॉर्ड सत्यापन में आंखें क्यों मूंद ली?
क्या पूरी प्रक्रिया “सेटिंग” और मोटी रकम के दम पर करवाई गई?


सूत्र बताते हैं कि बिना राजस्व अमले की सांठगांठ के आदिवासी भूमि का ऐसा परिवर्तन संभव नहीं। जमीन को पहले वैध दिखाने, फिर नामांतरण कराने और उसके बाद बैंक से लोन लेने की तैयारी तक की चर्चा है।

“स्वतः नामांतरण योजना” भी कटघरे में

सरकार की किसानों को राहत देने वाली “स्वतः नामांतरण योजना” अब राजस्व दलालों के लिए वरदान बनती दिख रही है। आरोप है कि इसी योजना की आड़ में भू-माफिया, रजिस्ट्री कार्यालय और राजस्व कर्मचारी मिलकर आदिवासी जमीनों को निशाना बना रहे हैं।

पहले सस्ते में जमीन की डील, फिर रिकॉर्ड में हेराफेरी, फिर बैकडेट आदेश और आखिर में मोटी रकम लेकर अवैध रजिस्ट्री।

स्थानीय लोगों का कहना है कि पत्थलगांव में यह कोई पहला मामला नहीं है। कई ऐसे प्रकरण दबे पड़े हैं जहां आदिवासी और शासकीय जमीनों को नियमों की धज्जियां उड़ाकर ट्रांसफर किया गया।

बड़ा सवाल — संरक्षण कानून आखिर किसके लिए?

आदिवासी जमीन की सुरक्षा के लिए बनाए गए कानून अगर राजस्व अफसरों की मिलीभगत से ही कमजोर पड़ जाएं, तो फिर आम आदिवासी न्याय की उम्मीद किससे करे?

अब मांग उठ रही है कि
पूरे मामले की उच्च स्तरीय जांच हो,
संबंधित तहसीलदार, SDM, पटवारी और कर्मचारियों की भूमिका जांची जाए,
रिकॉर्ड अपडेट करने वाली ID सार्वजनिक की जाए,
और दोषियों पर FIR दर्ज कर कार्रवाई की जाए।
वरना यह “170(ख) घोटाला” आने वाले समय में आदिवासी जमीनों की खुली लूट का सबसे बड़ा रास्ता बन सकता है।

“जमीन बचाओ” आंदोलन बनने लगी बड़ी लड़ाई

महिलाओं के इस विरोध प्रदर्शन के बाद अब मामला केवल एक जमीन विवाद तक सीमित नहीं रह गया है। गांव-गांव में आदिवासी समाज के लोग लामबंद होने लगे हैं। लोगों का कहना है कि अगर समय रहते इस “जमीन लूट नेटवर्क” पर कार्रवाई नहीं हुई तो आने वाले दिनों में बड़ा जनआंदोलन खड़ा हो सकता है।

आपको बता दें कि मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने एक दिवसीय जशपुर दौरे पर पत्रकारों से पूछे गए आदिवासी की जमीन को गैर आदिवासी (जनरल) के नाम चढ़ाया गया है, सवाल पूछने पर उन्होंने कहा है कि बिल्कुल शिकायत आने पर दोषियों के ऊपर कड़ी से कड़ी कार्यवाही की जाएगी।

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