परिसीमन पर आदिवासियों को गुमराह करने की साजिश? लेखक ने किया दावा— 'तथ्यों से नहीं, अफवाहों से फैलाया जा रहा भ्रम'। संविधान पर भरोसा रखें, परिसीमन से आदिवासी प्रतिनिधित्व घटेगा नहीं, बढ़ेगा: निर्मल कुमार

परिसीमन पर आदिवासियों को गुमराह करने की साजिश? लेखक ने किया दावा— 'तथ्यों से नहीं, अफवाहों से फैलाया जा रहा भ्रम'। संविधान पर भरोसा रखें, परिसीमन से आदिवासी प्रतिनिधित्व घटेगा नहीं, बढ़ेगा: निर्मल कुमार।

रायपुर/विशेष। परिसीमन को लेकर आदिवासी समाज के बीच फैलाए जा रहे भ्रम और आशंकाओं पर सामाजिक एवं आर्थिक मामलों के जानकार निर्मल कुमार ने अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। अपने निजी विचारों में उन्होंने दावा किया है कि कुछ निहित स्वार्थ वाले तत्व आदिवासी समाज को यह कहकर गुमराह करने की कोशिश कर रहे हैं कि आगामी परिसीमन से अनुसूचित जनजातियों (ST) का राजनीतिक प्रतिनिधित्व कम हो जाएगा, जबकि संविधान और उपलब्ध आंकड़े इससे अलग तस्वीर पेश करते हैं।

निर्मल कुमार का कहना है कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 330 और 332 में स्पष्ट प्रावधान है कि लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में अनुसूचित जनजातियों के लिए सीटों का आरक्षण उनकी जनसंख्या के अनुपात में सुनिश्चित किया जाएगा। ऐसे में परिसीमन की प्रक्रिया से आदिवासी प्रतिनिधित्व कम होने की आशंका तथ्यों पर आधारित नहीं है।

लेख में बताया गया है कि वर्ष 2001 की जनगणना में अनुसूचित जनजातियों की आबादी लगभग 8.43 करोड़ थी, जो 2011 में बढ़कर 10.42 करोड़ हो गई। यह वृद्धि राष्ट्रीय औसत से अधिक रही। लेखक का अनुमान है कि वर्तमान जनगणना में ST आबादी लगभग 12.7 करोड़ तक पहुंच सकती है, जिसके अनुरूप लोकसभा और विधानसभाओं में उनके प्रतिनिधित्व में भी वृद्धि होने की संभावना है।

लेख में यह भी उल्लेख किया गया है कि यदि भविष्य में लोकसभा सीटों की संख्या 543 से बढ़ाकर 850 की जाती है, तो अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित सीटों की संख्या भी जनसंख्या के अनुपात में बढ़ेगी। साथ ही, वर्ष 2008 से लागू पिछले परिसीमन का उदाहरण देते हुए कहा गया है कि उस समय लोकसभा में ST के लिए आरक्षित सीटें 41 से बढ़कर 47 हो गई थीं।

निर्मल कुमार ने आदिवासी समाज से अपील की है कि वे किसी भी प्रकार की अफवाह या भ्रामक प्रचार से प्रभावित होने के बजाय संविधान, आधिकारिक जनगणना और परिसीमन की प्रक्रिया पर भरोसा रखें। उनके अनुसार, सही जनगणना और निष्पक्ष परिसीमन ही किसी भी समुदाय को उसकी वास्तविक जनसंख्या के अनुरूप राजनीतिक प्रतिनिधित्व सुनिश्चित कर सकता है।

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